शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

ये जिंदगी कुछ ऐसे कहर ढाती है......

ये जिंदगी कुछ ऐसे कहर ढाती है,
काली रात के पहले रोशन सहर लाती है,
संवरती है कभी ये गुलशन की तरह,
और कभी टूटकर ये कांच सी बिखर जाती है |

टकराती हैं जैसे किनारों से लहरें,
कुछ इसी तरह हालात से टकराती है,
आते हैं कई मोड़ राह में मगर,
हर मोड़ से ये बिना रुके गुज़र जाती है|

मेहरवान हो किसी पर अगर ये जिंदगी,
तो हर पल को खुशबू सा  महकाती  है
और अगर किसी से रूठ जाये तो,
ये काँटों की झाड़ी सी नज़र आती है |

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वक़्त बेवक्त चली आती हैं यादें उनकी,
दर्द-ए-दिल को और बढाती हैं यादें उनकी,
हर अश्क  में नज़र आता चेहरा उनका,
कुछ इस तरह रुलाती हैं यादें उनकी |

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चाहा है उनको कुछ इस कदर हमने,
कि अपनी दुनिया उनके लिए पराई की है,
काँप उठते हैं अब वफ़ा के नाम से,
उन्होंने कुछ इस कदर बेवफाई की है |

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आज फिर मेरी आँखों में पानी है,
होंठो पर एक दर्द भरी कहानी है,
ए हवाओं थम जाओ कुछ देर के लिए,
मुझे दिल के ज़ख्मों में मरहम लगानी है|


 

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