सहर के आलम में खोया हूँ ,होती क्या है शाम ना जानू . इक आस लिए दिल में फिरता हूँ ,होगा क्या अंजाम ना. मुझसे मेरा पता ना पूछो ,मैं तो खुद का नाम ना जानू. जो कहना है खुलके कहो मैं नज़रों का पैगाम ना जानू .... कभी कभी जब तन्हा बैठता हूँ तो मेरे मन में कुछ हलचल होने लगती है और वही हलचल मेरे शब्दों के माध्यम से कागज़ पर उतर आती है ...और उसी हलचल को मैंने अपने इस ब्लॉग में डाला है. गगन गुर्जर "सारंग"
शुक्रवार, 25 मार्च 2011
जज़्बात: ......मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी |
जज़्बात: ......मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी : "हर कोई चाहता है मुकम्मल सी जिंदगी, मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी ****** किसके के लिए ..."
......मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी |
हर कोई चाहता है मुकम्मल सी जिंदगी,
मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी |
******
किसके के लिए जियें हम इस ज़माने में,
किसी को हमारी परवाह ही नहीं |
******
वक़्त की आंधी में जाने कहाँ खो गई,
वो गली सुकून जहाँ मिलता था मुझको |
******
तन्हाई में ये बहुत काम आयेगे,
इन बीते हुए लम्हों की हिफाज़त करना |
मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी |
******
किसके के लिए जियें हम इस ज़माने में,
किसी को हमारी परवाह ही नहीं |
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वक़्त की आंधी में जाने कहाँ खो गई,
वो गली सुकून जहाँ मिलता था मुझको |
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तन्हाई में ये बहुत काम आयेगे,
इन बीते हुए लम्हों की हिफाज़त करना |
गुरुवार, 24 मार्च 2011
जज़्बात: वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद.......
जज़्बात: वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद.......: "एक दास्ताँ मेरी अधूरी सी है पास होके भी किसी से दूरी सी है, कभी लगता है ये जिंदगी कुछ भी नहीं, कभी लगता है जैसे ये ज़रूरी सी है &n..."
वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद.......
एक दास्ताँ मेरी अधूरी सी है
पास होके भी किसी से दूरी सी है,
कभी लगता है ये जिंदगी कुछ भी नहीं,
कभी लगता है जैसे ये ज़रूरी सी है |
******
वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद,
चाहता तो वो भी है कि हमें ग़म न मिलें,
कोशिश हमेशा यही करता है कि,
हमें खुशियाँ औरों से कम न मिलें |
******
दर्द से रिश्ता जाने कितना पुराना है,
जब तनहा देखता है चला आता है,
वो लम्हा जिसे हम भूल जाना चाहते हैं,
उसी लम्हे की याद ताज़ा का जाता है |
******
जब भी मुस्कुराने की कोशिश की,
इस दिल से ये आवाज़ आई,
तेरा रिश्ता तो ग़मों से बहुत गहरा,
फिर होठों तक ये मुस्कान कहाँ से आई |
******
एक बार फिर जिंदगी मुस्कुराई और गले लग गई,
शायद वक़्त की हकीकत इसे भी पता चल गई |
पास होके भी किसी से दूरी सी है,
कभी लगता है ये जिंदगी कुछ भी नहीं,
कभी लगता है जैसे ये ज़रूरी सी है |
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वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद,
चाहता तो वो भी है कि हमें ग़म न मिलें,
कोशिश हमेशा यही करता है कि,
हमें खुशियाँ औरों से कम न मिलें |
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दर्द से रिश्ता जाने कितना पुराना है,
जब तनहा देखता है चला आता है,
वो लम्हा जिसे हम भूल जाना चाहते हैं,
उसी लम्हे की याद ताज़ा का जाता है |
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जब भी मुस्कुराने की कोशिश की,
इस दिल से ये आवाज़ आई,
तेरा रिश्ता तो ग़मों से बहुत गहरा,
फिर होठों तक ये मुस्कान कहाँ से आई |
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एक बार फिर जिंदगी मुस्कुराई और गले लग गई,
शायद वक़्त की हकीकत इसे भी पता चल गई |
बुधवार, 23 मार्च 2011
जज़्बात: ......वक़्त मिले तो हमें भी याद कर लेना |
जज़्बात: ......वक़्त मिले तो हमें भी याद कर लेना : "प्यार और दोस्ती का गहरा नाता है , बिना दोस्ती के कोई कहाँ प्यार पाता है , ये रिश्ते ही तो हैं जिन के बल पर जीते हैं लोग, और इन तीनो का संग..."
......वक़्त मिले तो हमें भी याद कर लेना |
बिना दोस्ती के कोई कहाँ प्यार पाता है ,
ये रिश्ते ही तो हैं जिन के बल पर जीते हैं लोग,
और इन तीनो का संगम जिंदगी कहलाता है |
**********************
मर गए फिर भी दिल में तेरा प्यार होगा,
होंठो पे मुस्कराहट आंखों में इंतजार होगा,
लाख इलज़ाम दे तुझको ये ज़माना,
फिर भी हमें तेरी बातों पर एतवार होगा |
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अपनी उम्मीदों का चमन तुम आबाद कर लेना,
हमारे लिए खुदा से फरियाद कर लेना,
हम नहीं कहते अपनी महफ़िल से हमारे पास आ जाओ,
पर वक़्त मिले तो हमें भी याद कर लेना |
***********************
एक दिन वक़्त के साथ बहुत आगे निकल जाओगे तुम,
मेरी दुआ से उस वक़्त भी मुस्कुराओगे तुम,
शायद किसी मोड़ पर तनहा छोड़ोगे तुम मुझको,
पर जब भी देखोगे पलटकर मुझे वहीँ खड़ा पाओगे तुम |
************************
तुम्हारी जिंदगी की हर शाम सुहानी होगी,
खुशियों की सदा तुम पर मेहरवानी होगी,
जब भी पलटोगे मेरी जिंदगी का कोई पन्ना,
हर पन्ने पर अश्कों की कहानी होगी |
गुरुवार, 17 मार्च 2011
दिल क्यूँ इतना मजबूर सा था......
करीब था सब कुछ फिर दूर क्या था,
दिल क्यूँ इतना मजबूर सा था,
मुस्कुराते मुस्कुराते वो दिल तोड़ गए ,
और हम अब भी सोचते हैं हमारा कसूर क्या था |
*************************
सूरज से ठंडक की अदा क्या मांगे,
गूंगे से कोई सदा क्या मांगे,
जिसके सर पर हों बेवफाई के इलज़ाम ही इलज़ाम,
उस शख्स से आखिर हम वफ़ा क्या मांगे |
*************************
मयकदे में उस दिन मयकसी का दौर था,
इक ओर ग़म के मारे थे जम -ए ख़ुशी इक ओर था,
वो लोग जो टूटे दिलों को चाहते थे जोड़ना,
किस्से वफ़ा के सुन पड़ा उन्हें मयकदा भी छोड़ना |
दिल क्यूँ इतना मजबूर सा था,
मुस्कुराते मुस्कुराते वो दिल तोड़ गए ,
और हम अब भी सोचते हैं हमारा कसूर क्या था |
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सूरज से ठंडक की अदा क्या मांगे,
गूंगे से कोई सदा क्या मांगे,
जिसके सर पर हों बेवफाई के इलज़ाम ही इलज़ाम,
उस शख्स से आखिर हम वफ़ा क्या मांगे |
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मयकदे में उस दिन मयकसी का दौर था,
इक ओर ग़म के मारे थे जम -ए ख़ुशी इक ओर था,
वो लोग जो टूटे दिलों को चाहते थे जोड़ना,
किस्से वफ़ा के सुन पड़ा उन्हें मयकदा भी छोड़ना |
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