सहर के आलम में खोया हूँ ,होती क्या है शाम ना जानू . इक आस लिए दिल में फिरता हूँ ,होगा क्या अंजाम ना. मुझसे मेरा पता ना पूछो ,मैं तो खुद का नाम ना जानू. जो कहना है खुलके कहो मैं नज़रों का पैगाम ना जानू .... कभी कभी जब तन्हा बैठता हूँ तो मेरे मन में कुछ हलचल होने लगती है और वही हलचल मेरे शब्दों के माध्यम से कागज़ पर उतर आती है ...और उसी हलचल को मैंने अपने इस ब्लॉग में डाला है. गगन गुर्जर "सारंग"
शुक्रवार, 25 मार्च 2011
जज़्बात: ......मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी |
जज़्बात: ......मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी : "हर कोई चाहता है मुकम्मल सी जिंदगी, मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी ****** किसके के लिए ..."
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