शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

जिंदगी की धूप और छाँव को पहचानिए



जिंदगी की  धूप  और छाँव को   पहचानिए,
क्या है दुनिया क्या नगर क्या गाँव को पहचानिए|
 
कुछ है दिल में आदमी के कह नहीं सकता है वो,
इसलिए हर आदमी के भाव को पहचानिए|
 
ज़ख्म जो तुमने दिया था अब तलक वो हरा,
और अब जो दे रहे उस घाव को पहचानिए|
 
रास्ते में आपके जो अड़ गया बनकर पहाड़,
कोई अपने का ही है उस पाँव को पहचानिए|
 
जाने ये किस राह से किस मोड़ तक ले जायेगा,
देखो संभलो मन के इस भटकाव को पहचानिए|
 
हो ना चोट भारी  दुश्मनों  की  आप  पर,
दुश्मनों की चाल और हर दांव को पहचानिए|
 
हर अँधेरी रात संग लाती है सुबह की रोशनी,
इसलिए अंधियारे के घेराव को पहचानिए|
 
सुन पकड़ 'सारंग' अब इस वक़्त की पतवार को,
रुक नहीं सकती कभी इस नाव को पहचानिए|

रविवार, 23 जनवरी 2011

तय है 'सारंग' का जल जाना

जिसको अपना सब कुछ  माना
हर पल जिसको चाहा पाना .
ये कैसा इंसाफ है रब का,
उसने न हमको पहचाना.

उसकी ख़ुशी कि खातिर हम तो,
अपनी जान भी दें नजराना.
उसके बिन हम हम ही नहीं,
उसने क्यों न इतना जाना,

कहाँ जाएँ कैसे हम जीयें,
हमें है सारा जग अंजाना.
अपना उसको समझा हमने ,
उसने न चाहा अपनाना.

खैर ये दुनिया की रीति है,
कलियों का खिलकर मुरझाना,
शमा को पाने की चाहत में,
परवाने का हंसकर जल जाना,

तेज़ हवाएं हैं दुनियां की ,
मुश्किल है इनसे टकराना.
या रब मुझे बचाले वर्ना,
तय है 'सारंग' का जल जाना

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

चेहरे पे कई चेहरे लगाता है आदमी,



चेहरे  पे  कई  चेहरे  लगाता  है आदमी,
रुलाता है आदमी और हंसाता   है आदमी.

है दुनिया देखलो एक सर्कस का नमूना,
जोकर के रूप में नज़र आता है आदमी.

घर को बनाता है ये खुशियों का गुल्स्तां,
मकान को श्मशान बनाता है आदमी.

करता है खुद ही जुर्म और बनता है गुनहगार,
औरों को फिर शैतान बताता है आदमी.

अपनों की कभी क़द्र ये कर पायेगा नहीं,
गैरों पे मगर जान लुटाता है आदमी.

बुज़दिल हो जिंदगी से भाग रहा है,
अब मौत को आसान बताता है आदमी.

दुनिया की चकाचौंध में होकर के ये अँधा,
खुद अपनी ही पहचान गंवाता है आदमी.

मालूम है एक दिन ढह जाना है इसको,
क्यों रेत के मकान बनाता है आदमी.

ये कर्म हैं 'सारंग' जो शैतान बना दें,
और कर्म से भगवान कहाता है आदमी.

बुधवार, 19 जनवरी 2011

करोगे याद तो हर इक फ़साना याद आएगा.


रोगे याद तो हर इक फ़साना याद आएगा.
तुमको वो गुज़रा ज़माना याद आएगा.

कब तलक बीते पलों से दूर जाओगे,
फिर कोई लम्हा सुहाना याद आएगा.

होंगे वही साज फिर महफ़िल वही होगी,
तुको मेरा गुनगुनाना याद आएगा.

आज तुम दिल तोड़कर तो मुस्कुराते हो,
कल तुम्हे दिल का लगाना याद आएगा.

किस कदर फूलों से यारी करते थे हम तुम,
बागों से हर गुल चुराना याद आएगा.

तारों के दर्मियां जो मैंने बनाया था,
फलक पर वो आशियाना याद आएगा.

'सारंग' ने फिर ग़ज़ल कोई लिखी होगी नयी,
फिर तुम्हे पढ़कर सुनाना याद आएगा.

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

जिंदगी इस तरह से पिघलती रही,



जिंदगी इस तरह से पिघलती रही,
तुझसे मिलने की चाहत मचलती रही
इक किनारे पे परवाना तपता रहा,
इक किनारे पे शमा भी जलती रही.


ख्यालों में खोया रहा मेरा दिल,
इन लवों पे ग़ज़ल कोई बनती रही.
हम वो शायर हैं जिसकी हर इक शायरी,
तेरी सूरत पे आके  सिमटती रही.


अपनी हर सांस ने नाम तेरा लिया,
नाम से तेरे धड़कन धड़कती रही.
हर दिल में बनता तेरा बुत रहा,
हर पलक बस तेरा ख्वाब बुनती रही.


तन्हाइयों  में    भी   है   चैन   अब,
महफ़िलों में तो रंगत  बरसती रही,
तेरी तारीफ़ में संग छोड़ा अल्फाजों ने,
'सारंग ' की कलम फिर भी चलती रही.

सोमवार, 17 जनवरी 2011

बेख़ौफ़ चल रहे थे हम साथ - साथ उनके

बेख़ौफ़ चल रहे थे हम साथ - साथ उनके
कुछ गिर संभल रहे थे हम साथ - साथ उनके.

इक मोड़ आया रास्ता वो खुद भटक रहे थे,
और मंजिल बदल रहे थे हम साथ - साथ उनके.

बेनियाजना* कोई ठिकाना मिलता है कहीं ,
पर कुछ बहल रहे थे हम साथ - साथ उनके.

क्यूँ फंस गए थे आखिर उनके ज़माल* में हम,
अब हाथ मल रहे थे हम साथ - साथ उनके.

ग़म ए हस्ति के जुज़* और क्या 'सारंग' के है पास,
खुश चंद पल रहे थे हम साथ - साथ उनके.


मायने:

बेनियाजना - बिना मकसद

ज़माल - खूबसूरती

जुज़ - के बिना

रविवार, 16 जनवरी 2011

तन्हाई में चली आती हैं यादें उनकी,



नज़र ढूंढती है अब भी ठिकाना दिल का,
अभी तक हाल किसी ने भी ना जाना दिल का.
वक़्त ने ये किस मोड़ पर लाकर खड़ा किया ,
कि मुश्किल हो रहा है अब संभल पाना दिल का.

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तन्हाई में चली आती हैं यादें उनकी,
इक ज़ख्म सा दे जाती हैं यादें उनकी.
हम चाहते तो हैं कि दुनिया से छुपाले,
पर आँखों से बरस जाती हैं यादें उनकी.