सोमवार, 18 अप्रैल 2011

जिंदगी में दिल लगाने की सजा मिलती है क्यों,

ए जिंदगी एक हंसीं बहार दे दे,
मुझे झूठा ही सही थोडा सा प्यार दे दे ,
इस कदर मेरे दामन में तू गम तो न भर,
कि मैं किसी से कहूँ एक ख़ुशी उधार दे दे |

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अपनी दास्तान हम किसी को सुना ना पाए,
मुस्कुराना चाहा पर मुस्कुरा ना पाए,
सोचते रहे कहीं तो कोई अपना होगा,
पर हकीक़त ये है हम किसी को अपना बना ना पाए |

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किसी को क्या बताएं इस दिल में दर्द है कितना,
कौन है जो सुन सकेगा दास्तां मेरी,
दर्द और मेरा तो कुछ रिश्ता ही ऐसा है,
इस दर्द के साथ ही निकलेगी लगता है जां मेरी |

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जिंदगी में दिल लगाने की सजा मिलती है क्यों,
प्यार के परवाने पर ही बिजलियाँ गिरती हैं क्यों,
जिसको कोई भी खबर हमारी होती नहीं,
उस बेखबर को नज़रें अक्सर ढूंढती फिरती हैं क्यों |

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जिंदगी की अपनी कोई दास्तां होगी,
सन्नाटे में गूंजती कोई सदा होगी,
देखते हैं कब तलक हमको सताएगी,
कभी तो किस्मत हम पर मेहरबां होगी |

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

हर चीज़ है महँगी यहाँ फिर दर्द ही सस्ते है क्यों?

मैं हूँ वही दुनिया वही बदले हुए रिश्ते हैं क्यों?
हर चीज़ है महँगी यहाँ फिर दर्द ही सस्ते है क्यों?

रिश्ते जोड़ने और तोड़ने वक़्त अब लगता नहीं,
दिल में किसी के वास्ते अरमान फिर बसते हैं क्यों?

अक्सर जो लोग होते हैं दिल के करीब ,
आखिर उन्ही से मिलने को हम तरसते हैं क्यों ?

जो भूल जाया करते हैं बड़ी आसानी से हमें,
उनकी यादों में ही फिर ये नैन बरसते हैं क्यों?

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

ये जिंदगी कुछ ऐसे कहर ढाती है......

ये जिंदगी कुछ ऐसे कहर ढाती है,
काली रात के पहले रोशन सहर लाती है,
संवरती है कभी ये गुलशन की तरह,
और कभी टूटकर ये कांच सी बिखर जाती है |

टकराती हैं जैसे किनारों से लहरें,
कुछ इसी तरह हालात से टकराती है,
आते हैं कई मोड़ राह में मगर,
हर मोड़ से ये बिना रुके गुज़र जाती है|

मेहरवान हो किसी पर अगर ये जिंदगी,
तो हर पल को खुशबू सा  महकाती  है
और अगर किसी से रूठ जाये तो,
ये काँटों की झाड़ी सी नज़र आती है |

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वक़्त बेवक्त चली आती हैं यादें उनकी,
दर्द-ए-दिल को और बढाती हैं यादें उनकी,
हर अश्क  में नज़र आता चेहरा उनका,
कुछ इस तरह रुलाती हैं यादें उनकी |

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चाहा है उनको कुछ इस कदर हमने,
कि अपनी दुनिया उनके लिए पराई की है,
काँप उठते हैं अब वफ़ा के नाम से,
उन्होंने कुछ इस कदर बेवफाई की है |

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आज फिर मेरी आँखों में पानी है,
होंठो पर एक दर्द भरी कहानी है,
ए हवाओं थम जाओ कुछ देर के लिए,
मुझे दिल के ज़ख्मों में मरहम लगानी है|


 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

समां की चाह में जलता परवाना मिला हमको

हकीकत ढूँढने निकले अफसाना मिला हमको,
समां की चाह में जलता परवाना मिला हमको |

जिनसे हसरतें थी दिल की वो दिल तोड़कर गए,
वफ़ा की राह में क्या खूब नजराना मिला हमको |

कोई दौलत के वास्ते, कोई सोहरत के वास्ते.
दुनिया में हर इक शख्स दीवाना मिला हमको |

सोचा की गम की दवा शायद मयकदे में हो,
लेकिन वहां खाली हर पैमाना मिला हमको |

कभी रोते हैं कभी इस पर हंसी आ जाती है हमको,
या खुदा क्या खूब ज़माना मिला हमको |

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

जज़्बात: ......मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी |

जज़्बात: ......मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी : "हर कोई चाहता है मुकम्मल सी जिंदगी, मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी ****** किसके के लिए ..."

......मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी |

हर कोई चाहता है मुकम्मल सी जिंदगी,
मिलती है मगर जाने क्यों ओझल सी जिंदगी |

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किसके के लिए जियें हम इस ज़माने में,
किसी को हमारी परवाह ही नहीं |

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वक़्त की आंधी में जाने कहाँ खो गई,
वो गली सुकून जहाँ मिलता था मुझको |

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तन्हाई में ये बहुत काम आयेगे,
इन बीते हुए लम्हों की हिफाज़त करना |

गुरुवार, 24 मार्च 2011

जज़्बात: वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद.......

जज़्बात: वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद.......: "एक दास्ताँ मेरी अधूरी सी है पास होके भी किसी से दूरी सी है, कभी लगता है ये जिंदगी कुछ भी नहीं, कभी लगता है जैसे ये ज़रूरी सी है &n..."

वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद.......

एक दास्ताँ मेरी अधूरी सी है
पास होके भी किसी से दूरी सी है,
कभी लगता है ये जिंदगी कुछ भी नहीं,
कभी लगता है जैसे ये ज़रूरी सी है |

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वक़्त की भी कुछ मजबूरियां हैं शायद,
चाहता तो वो भी है कि हमें ग़म न मिलें,
कोशिश हमेशा यही करता है कि,
हमें खुशियाँ औरों से कम न मिलें |

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दर्द से रिश्ता जाने कितना पुराना है,
जब तनहा देखता है चला आता है,
वो लम्हा जिसे हम भूल जाना चाहते हैं,
उसी लम्हे की याद ताज़ा का जाता है |

                     ******

जब भी मुस्कुराने की कोशिश की,
इस दिल से ये आवाज़ आई,
तेरा रिश्ता तो ग़मों से बहुत गहरा,
फिर होठों तक ये मुस्कान कहाँ से आई |

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एक बार फिर जिंदगी मुस्कुराई और गले लग गई,
शायद वक़्त की हकीकत इसे भी पता चल गई |

बुधवार, 23 मार्च 2011

जज़्बात: ......वक़्त मिले तो हमें भी याद कर लेना |

जज़्बात: ......वक़्त मिले तो हमें भी याद कर लेना : "प्यार और दोस्ती का गहरा नाता है , बिना दोस्ती के कोई कहाँ प्यार पाता है , ये रिश्ते ही तो हैं जिन के बल पर जीते हैं लोग, और इन तीनो का संग..."

......वक़्त मिले तो हमें भी याद कर लेना |



प्यार और दोस्ती का गहरा नाता है ,
बिना दोस्ती के कोई कहाँ प्यार पाता है ,
ये रिश्ते ही तो हैं जिन के बल पर जीते हैं लोग,
और इन तीनो का संगम जिंदगी कहलाता है |

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मर गए फिर भी दिल में तेरा प्यार होगा,
होंठो पे मुस्कराहट आंखों में इंतजार होगा,
लाख इलज़ाम दे तुझको  ये ज़माना,
फिर भी हमें तेरी बातों पर एतवार होगा |

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अपनी उम्मीदों का चमन तुम आबाद कर लेना,
हमारे लिए खुदा से फरियाद कर लेना,
हम नहीं कहते अपनी महफ़िल से हमारे पास आ जाओ,
पर वक़्त मिले तो हमें भी याद कर लेना |

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एक दिन वक़्त के साथ बहुत आगे निकल जाओगे तुम,
मेरी दुआ से उस वक़्त भी मुस्कुराओगे तुम,
शायद किसी मोड़ पर तनहा छोड़ोगे तुम मुझको,
पर जब भी देखोगे पलटकर मुझे वहीँ खड़ा पाओगे तुम |

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तुम्हारी जिंदगी की हर शाम सुहानी होगी,
खुशियों की सदा तुम पर मेहरवानी होगी,
जब भी पलटोगे मेरी जिंदगी का कोई पन्ना,
हर पन्ने पर अश्कों की कहानी होगी |

गुरुवार, 17 मार्च 2011

दिल क्यूँ इतना मजबूर सा था......

करीब था सब कुछ फिर दूर क्या था,
दिल क्यूँ इतना मजबूर सा था,
मुस्कुराते मुस्कुराते वो दिल तोड़ गए ,
और हम अब भी सोचते हैं हमारा कसूर क्या था |

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सूरज से ठंडक की अदा क्या मांगे,
गूंगे से कोई सदा क्या मांगे,
जिसके सर पर हों बेवफाई के इलज़ाम ही इलज़ाम,
उस शख्स से आखिर हम वफ़ा क्या मांगे |

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मयकदे में उस दिन मयकसी का दौर था,
इक ओर ग़म के मारे थे जम -ए ख़ुशी इक ओर था,
वो लोग जो टूटे दिलों को चाहते थे जोड़ना,
किस्से वफ़ा के सुन पड़ा उन्हें मयकदा भी छोड़ना |

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

जज़्बात: मैं खुलकर जब ख़ुशी मनाऊं ऐसा अब त्यौहार कहाँ है |

जज़्बात: मैं खुलकर जब ख़ुशी मनाऊं ऐसा अब त्यौहार कहाँ है : "ग़म को बांटे ख़ुशी समझकर ऐसा कोई यार कहाँ है, रात - रात जग करे जो चौकी ऐसा पहरेदार कहाँ है, मै कैसी उलझन में उलझा समझ में कुछ भी आये ना, ख..."

मैं खुलकर जब ख़ुशी मनाऊं ऐसा अब त्यौहार कहाँ है |



ग़म को बांटे ख़ुशी समझकर ऐसा कोई यार कहाँ है,
रात - रात जग करे जो चौकी ऐसा पहरेदार कहाँ है,
मै कैसी उलझन में उलझा समझ में कुछ भी आये ना,
खड़ा हूँ घर के सामने लेकिन पूछूं घर का द्वार कहाँ हैं |


मेरी जीवन रेखा देखो इसका आखिर पार कहाँ है,
ग़म के ढेर हजारों हैं पर खुशियों का अम्बार कहाँ है,
एक सवाल हैं मेरे दिल में जिसका हल मैं रब से मांगू,
मैं खुलकर जब ख़ुशी मनाऊं ऐसा अब त्यौहार कहाँ है |

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

जज़्बात: मुफ्त हुए बदनाम तुम्हारे शहर में आके'

जज़्बात: मुफ्त हुए बदनाम तुम्हारे शहर में आके': "मुफ्त हुए बदनाम तुम्हारे शहर में आके' मिला एक अलग ही नाम तुम्हारे शहर में आके आये थे अपने दिल में हम ..."

मुफ्त हुए बदनाम तुम्हारे शहर में आके'

मुफ्त   हुए बदनाम   तुम्हारे  शहर  में आके'
मिला एक अलग ही नाम तुम्हारे शहर में आके |

आये थे अपने दिल में हम खुशियों का अरमान लिए,
मिल गए अश्क  तमाम  तुम्हारे  शहर  में   आके |

अजनबियों की इस बस्ती में अपना ढूँढने हम निकले,
मिला  न   कोई   मुकाम  तुम्हारे  शहर में आके |

वक़्त ने कैसा पलता पलड़ा कैसे तुम्हे बताएं हम,
काँप   उठे   अरमान   तुम्हारे   शहर में आके |

हम हैं 'सारंग' इक परदेशी रास्ता भूल गए थे हम,
हो   गई  सुबह   से शाम तुम्हारे शहर में आके |

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

चोरी - चोरी चुपके - चुपके वो किसे निहारा करती थी,


चोरी - चोरी  चुपके - चुपके  वो  किसे  निहारा  करती थी,
कभी कभी खिड़की पर आ  वो ज़ुल्फ़ संवारा  करती थी,
मै सोचता था करती है क्या वो रात को तन्हा छत पर आ,
इक रोज़ मुझे महशूश हुआ वो मुझे इशारा करती थी |

बस उसी रोज़ से सीने में इक धड़कन नई सुनाई दी,
उसने अपनी हर धड़कन   खुद मेरे लिए पराई की,
मै टूट चुका था बुरी तरह तन्हा दुनिया की राहों में,
पर उसकी नज़रों में अपनेपन की मुझको झलक दिखाई दी|

आगे क्या चल पड़ा उसी की प्यार भरी उन  राहों  में,
हर   दर्द ख़ुशी में   बदल गया   जब आया  उसकी बाहों में,
उसने देखा तो संवर गया बिखरा सा मेरे दिल का नगर,
था जैसे जादू कोई उसकी मदमस्त निगाहों में|

जब जब वो मुझसे मिलती थी दिल की कलियाँ खिल जाती थीं,
वो दर्द भरी इस दुनिया में जीना मुझको सिखलाती थी,
वो लगती थी क्या मेरी ये तो मुझको मालूम नहीं,
लेकिन उसके साथ मुझे सारी खुशियाँ मिल जाती थीं|


निरंतर ......................

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

जिंदगी की धूप और छाँव को पहचानिए



जिंदगी की  धूप  और छाँव को   पहचानिए,
क्या है दुनिया क्या नगर क्या गाँव को पहचानिए|
 
कुछ है दिल में आदमी के कह नहीं सकता है वो,
इसलिए हर आदमी के भाव को पहचानिए|
 
ज़ख्म जो तुमने दिया था अब तलक वो हरा,
और अब जो दे रहे उस घाव को पहचानिए|
 
रास्ते में आपके जो अड़ गया बनकर पहाड़,
कोई अपने का ही है उस पाँव को पहचानिए|
 
जाने ये किस राह से किस मोड़ तक ले जायेगा,
देखो संभलो मन के इस भटकाव को पहचानिए|
 
हो ना चोट भारी  दुश्मनों  की  आप  पर,
दुश्मनों की चाल और हर दांव को पहचानिए|
 
हर अँधेरी रात संग लाती है सुबह की रोशनी,
इसलिए अंधियारे के घेराव को पहचानिए|
 
सुन पकड़ 'सारंग' अब इस वक़्त की पतवार को,
रुक नहीं सकती कभी इस नाव को पहचानिए|

रविवार, 23 जनवरी 2011

तय है 'सारंग' का जल जाना

जिसको अपना सब कुछ  माना
हर पल जिसको चाहा पाना .
ये कैसा इंसाफ है रब का,
उसने न हमको पहचाना.

उसकी ख़ुशी कि खातिर हम तो,
अपनी जान भी दें नजराना.
उसके बिन हम हम ही नहीं,
उसने क्यों न इतना जाना,

कहाँ जाएँ कैसे हम जीयें,
हमें है सारा जग अंजाना.
अपना उसको समझा हमने ,
उसने न चाहा अपनाना.

खैर ये दुनिया की रीति है,
कलियों का खिलकर मुरझाना,
शमा को पाने की चाहत में,
परवाने का हंसकर जल जाना,

तेज़ हवाएं हैं दुनियां की ,
मुश्किल है इनसे टकराना.
या रब मुझे बचाले वर्ना,
तय है 'सारंग' का जल जाना

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

चेहरे पे कई चेहरे लगाता है आदमी,



चेहरे  पे  कई  चेहरे  लगाता  है आदमी,
रुलाता है आदमी और हंसाता   है आदमी.

है दुनिया देखलो एक सर्कस का नमूना,
जोकर के रूप में नज़र आता है आदमी.

घर को बनाता है ये खुशियों का गुल्स्तां,
मकान को श्मशान बनाता है आदमी.

करता है खुद ही जुर्म और बनता है गुनहगार,
औरों को फिर शैतान बताता है आदमी.

अपनों की कभी क़द्र ये कर पायेगा नहीं,
गैरों पे मगर जान लुटाता है आदमी.

बुज़दिल हो जिंदगी से भाग रहा है,
अब मौत को आसान बताता है आदमी.

दुनिया की चकाचौंध में होकर के ये अँधा,
खुद अपनी ही पहचान गंवाता है आदमी.

मालूम है एक दिन ढह जाना है इसको,
क्यों रेत के मकान बनाता है आदमी.

ये कर्म हैं 'सारंग' जो शैतान बना दें,
और कर्म से भगवान कहाता है आदमी.

बुधवार, 19 जनवरी 2011

करोगे याद तो हर इक फ़साना याद आएगा.


रोगे याद तो हर इक फ़साना याद आएगा.
तुमको वो गुज़रा ज़माना याद आएगा.

कब तलक बीते पलों से दूर जाओगे,
फिर कोई लम्हा सुहाना याद आएगा.

होंगे वही साज फिर महफ़िल वही होगी,
तुको मेरा गुनगुनाना याद आएगा.

आज तुम दिल तोड़कर तो मुस्कुराते हो,
कल तुम्हे दिल का लगाना याद आएगा.

किस कदर फूलों से यारी करते थे हम तुम,
बागों से हर गुल चुराना याद आएगा.

तारों के दर्मियां जो मैंने बनाया था,
फलक पर वो आशियाना याद आएगा.

'सारंग' ने फिर ग़ज़ल कोई लिखी होगी नयी,
फिर तुम्हे पढ़कर सुनाना याद आएगा.

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

जिंदगी इस तरह से पिघलती रही,



जिंदगी इस तरह से पिघलती रही,
तुझसे मिलने की चाहत मचलती रही
इक किनारे पे परवाना तपता रहा,
इक किनारे पे शमा भी जलती रही.


ख्यालों में खोया रहा मेरा दिल,
इन लवों पे ग़ज़ल कोई बनती रही.
हम वो शायर हैं जिसकी हर इक शायरी,
तेरी सूरत पे आके  सिमटती रही.


अपनी हर सांस ने नाम तेरा लिया,
नाम से तेरे धड़कन धड़कती रही.
हर दिल में बनता तेरा बुत रहा,
हर पलक बस तेरा ख्वाब बुनती रही.


तन्हाइयों  में    भी   है   चैन   अब,
महफ़िलों में तो रंगत  बरसती रही,
तेरी तारीफ़ में संग छोड़ा अल्फाजों ने,
'सारंग ' की कलम फिर भी चलती रही.

सोमवार, 17 जनवरी 2011

बेख़ौफ़ चल रहे थे हम साथ - साथ उनके

बेख़ौफ़ चल रहे थे हम साथ - साथ उनके
कुछ गिर संभल रहे थे हम साथ - साथ उनके.

इक मोड़ आया रास्ता वो खुद भटक रहे थे,
और मंजिल बदल रहे थे हम साथ - साथ उनके.

बेनियाजना* कोई ठिकाना मिलता है कहीं ,
पर कुछ बहल रहे थे हम साथ - साथ उनके.

क्यूँ फंस गए थे आखिर उनके ज़माल* में हम,
अब हाथ मल रहे थे हम साथ - साथ उनके.

ग़म ए हस्ति के जुज़* और क्या 'सारंग' के है पास,
खुश चंद पल रहे थे हम साथ - साथ उनके.


मायने:

बेनियाजना - बिना मकसद

ज़माल - खूबसूरती

जुज़ - के बिना

रविवार, 16 जनवरी 2011

तन्हाई में चली आती हैं यादें उनकी,



नज़र ढूंढती है अब भी ठिकाना दिल का,
अभी तक हाल किसी ने भी ना जाना दिल का.
वक़्त ने ये किस मोड़ पर लाकर खड़ा किया ,
कि मुश्किल हो रहा है अब संभल पाना दिल का.

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तन्हाई में चली आती हैं यादें उनकी,
इक ज़ख्म सा दे जाती हैं यादें उनकी.
हम चाहते तो हैं कि दुनिया से छुपाले,
पर आँखों से बरस जाती हैं यादें उनकी.